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BIHAR REGISTRY: पेपरलेस रजिस्ट्री से बिहार में जमीन निबंधन की रफ्तार धीमी, राजस्व संग्रह पर असर; भोजपुर में भी परेशानी

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | पेपरलेस रजिस्ट्री व्यवस्था लागू होने के बाद बिहार के कई निबंधन कार्यालयों में जमीन के दस्तावेजों के निबंधन की गति प्रभावित हुई है। भोजपुर में भी नई डिजिटल प्रक्रिया को लेकर लोगों और कातिबों में असमंजस है।

आरा, 29 अगस्त। बिहार में जमीन के दस्तावेजों के निबंधन की प्रक्रिया को डिजिटल और पेपरलेस बनाने की पहल अब व्यवहारिक चुनौतियों के बीच दिखाई दे रही है। नई व्यवस्था लागू होने के बाद कई निबंधन कार्यालयों में रजिस्ट्री की रफ्तार पहले की तुलना में धीमी हुई है। इसका सीधा असर जमीन की खरीद-बिक्री से जुड़े लोगों के साथ-साथ सरकारी राजस्व संग्रह पर भी पड़ता दिख रहा है। भोजपुर जिले की स्थिति इसी बदलाव की एक तस्वीर पेश कर रही है, जहां नई प्रक्रिया को लेकर लोगों और दस्तावेज लेखकों के बीच अभी पूरी तरह सहजता नहीं बन पाई है।

दरअसल, बिहार में जमीन के दस्तावेजों के निबंधन की प्रक्रिया को कागजी व्यवस्था से निकालकर डिजिटल प्रणाली से जोड़ने की दिशा में पेपरलेस रजिस्ट्री व्यवस्था लागू की गई है। इसका उद्देश्य प्रक्रिया को आधुनिक, पारदर्शी और कम कागजी बनाना है। लेकिन व्यवस्था बदलने के साथ उसके तकनीकी पहलुओं को समझने और अपनाने में समय लग रहा है। नतीजा यह है कि कुछ निबंधन कार्यालयों में एक दिन में होने वाले दस्तावेजों के निबंधन की संख्या प्रभावित हुई है।

नई व्यवस्था में दस्तावेज तैयार करने से लेकर सत्यापन और निबंधन की प्रक्रिया में कई चरण डिजिटल माध्यम से पूरे किए जा रहे हैं। मोबाइल पर ओटीपी, ऑनलाइन जानकारी का सत्यापन और अन्य डिजिटल प्रक्रियाएं अब रजिस्ट्री का हिस्सा बन गई हैं। जिन लोगों और दस्तावेज लेखकों को पहले कागजी प्रक्रिया का अनुभव था, उनके लिए यह बदलाव शुरुआत में आसान नहीं साबित हो रहा है।

ग्रामीण इलाकों से निबंधन कार्यालय पहुंचने वाले लोगों के सामने भी कई सवाल हैं। उन्हें यह समझने में परेशानी हो रही है कि नई प्रक्रिया में कौन-कौन से चरण पूरे करने होंगे, मोबाइल पर आने वाले ओटीपी का इस्तेमाल कैसे होगा और दस्तावेजों का डिजिटल सत्यापन किस तरह किया जाएगा। ऐसे में कुछ लोग तत्काल रजिस्ट्री कराने के बजाय प्रक्रिया के पूरी तरह स्पष्ट होने का इंतजार कर रहे हैं।

भोजपुर में सामने आ रही स्थिति को इसी व्यापक बदलाव से जोड़कर देखा जा रहा है। यहां भी निबंधन कार्यालयों में नई व्यवस्था के कारण काम की गति प्रभावित होने की बात सामने आ रही है। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि यह समस्या किसी बड़ी तकनीकी खामी के कारण नहीं है, बल्कि नई व्यवस्था को लेकर लोगों में बनी झिझक और भ्रम इसका प्रमुख कारण है।

जिला अवर निबंधन पदाधिकारी का कहना है कि नई पेपरलेस व्यवस्था को लेकर लोगों को अनावश्यक रूप से डरने की जरूरत नहीं है। मोबाइल आधारित ओटीपी और ऑनलाइन सत्यापन जैसी प्रक्रियाओं को लेकर जो आशंकाएं लोगों के बीच हैं, वे पूरी जानकारी मिलने के बाद दूर हो सकती हैं। अधिकारियों के अनुसार, प्रक्रिया को समझने के बाद जमीन के दस्तावेजों का निबंधन सामान्य तरीके से किया जा सकता है।

दूसरी ओर, कातिब और दस्तावेज लेखक नई व्यवस्था को लेकर अपनी अलग चिंता जता रहे हैं। कातिब संघ का विरोध मुख्य रूप से इस बात को लेकर है कि पूरी प्रक्रिया डिजिटल होने से उनके पारंपरिक काम की भूमिका कम हो सकती है। संघ की ओर से यह आशंका भी जताई जा रही है कि यदि व्यवस्था पूरी तरह डिजिटल माध्यम पर निर्भर हो गई तो बड़ी संख्या में दस्तावेज लेखकों के सामने रोजगार का संकट पैदा हो सकता है।

कातिबों के विरोध का असर भी कुछ स्थानों पर निबंधन की प्रक्रिया पर पड़ा है। पहले जहां दस्तावेज तैयार करने, जांच कराने और रजिस्ट्री की प्रक्रिया में कातिबों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी, वहीं अब डिजिटल प्रक्रिया के बढ़ते दायरे ने उनके काम करने के तरीके को बदल दिया है। इस बदलाव को लेकर प्रशासन और कातिब संघ के बीच बेहतर संवाद की जरूरत महसूस की जा रही है।

हालांकि पेपरलेस रजिस्ट्री का उद्देश्य जमीन के निबंधन को आसान और आधुनिक बनाना है, लेकिन किसी भी नई डिजिटल व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे इस्तेमाल करने वाले लोगों को कितनी आसानी से समझाया और प्रशिक्षित किया जाता है। बिहार में बड़ी संख्या में जमीन की खरीद-बिक्री ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में होती है, जहां हर व्यक्ति डिजिटल प्रक्रिया से समान रूप से परिचित नहीं है। ऐसे में व्यवस्था लागू करने के साथ पर्याप्त सहायता और मार्गदर्शन उपलब्ध कराना जरूरी हो जाता है।

रजिस्ट्री की गति कम होने का असर केवल आम लोगों के समय पर नहीं पड़ता। जमीन की खरीद-बिक्री से सरकार को मिलने वाला निबंधन शुल्क और अन्य राजस्व भी इससे जुड़ा है। यदि दस्तावेजों का निबंधन कम होता है तो स्वाभाविक रूप से सरकारी राजस्व संग्रह की गति भी प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि पेपरलेस व्यवस्था के सुचारू संचालन का महत्व प्रशासनिक सुविधा से कहीं अधिक है।

पूरे बिहार में इस बदलाव को लेकर अलग-अलग निबंधन कार्यालयों की स्थिति आने वाले दिनों में और स्पष्ट होगी। फिलहाल भोजपुर की स्थिति यह संकेत देती है कि तकनीकी बदलाव को जमीन पर पूरी तरह लागू करने के लिए सिर्फ सॉफ्टवेयर और ऑनलाइन व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। लोगों को प्रक्रिया समझाना, कातिबों को प्रशिक्षित करना और निबंधन कार्यालयों में तकनीकी सहायता उपलब्ध कराना भी उतना ही जरूरी है।

विशेषज्ञों और अधिकारियों की उम्मीद है कि शुरुआती दौर की परेशानियां धीरे-धीरे कम होंगी। जैसे-जैसे कातिब, दस्तावेज लेखक और आम लोग डिजिटल प्रक्रिया के अभ्यस्त होंगे, निबंधन की गति में सुधार आ सकता है। लेकिन इसके लिए व्यवस्था को सरल, स्पष्ट और उपयोगकर्ता के अनुकूल बनाए रखना होगा।

बिहार में जमीन की रजिस्ट्री से जुड़ा यह बदलाव आने वाले समय में राज्य की पूरी निबंधन व्यवस्था को प्रभावित करने वाला है। इसलिए इसे केवल भोजपुर की समस्या मानना सही नहीं होगा। भोजपुर में सामने आई दिक्कतें दरअसल उस संक्रमणकाल की तस्वीर हैं, जिससे बिहार के कई निबंधन कार्यालय गुजर रहे हैं। अब चुनौती यह है कि पेपरलेस व्यवस्था के उद्देश्य—पारदर्शिता, सुविधा और तेजी—को जमीन पर भी उसी रूप में हासिल किया जाए।

यह भी पढ़ें: • बिहार में जमीन और संपत्ति से जुड़े नियमों में बदलाव, जानिए निबंधन प्रक्रिया की नई व्यवस्था • जमीन की खरीद-बिक्री से पहले इन दस्तावेजों की जांच जरूरी, छोटी गलती पड़ सकती है भारी

COMMENTARY:

बिहार में पेपरलेस रजिस्ट्री की शुरुआत तकनीकी बदलाव से कहीं बड़ा कदम है। इसका उद्देश्य निश्चित रूप से निबंधन व्यवस्था को आधुनिक और पारदर्शी बनाना है, लेकिन किसी भी डिजिटल व्यवस्था की असली सफलता तभी मानी जाएगी जब आम नागरिक उसे बिना डर और परेशानी के इस्तेमाल कर सके।

भोजपुर में रजिस्ट्री की धीमी गति और कातिब संघ का विरोध इस बात की ओर संकेत करता है कि व्यवस्था लागू करने के साथ उसके उपयोगकर्ताओं को पर्याप्त प्रशिक्षण और जानकारी देना भी जरूरी है। खासकर ग्रामीण बिहार में ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो डिजिटल प्रक्रिया से पूरी तरह परिचित नहीं हैं। उनके लिए निबंधन कार्यालयों में स्पष्ट मार्गदर्शन और तकनीकी सहायता उपलब्ध होनी चाहिए।

सरकार के लिए एक और महत्वपूर्ण पहलू राजस्व है। जमीन के दस्तावेजों का निबंधन जितना सुचारू होगा, सरकारी राजस्व संग्रह भी उतना ही बेहतर रहेगा। इसलिए प्रशासन को कातिबों की आशंकाओं पर भी संवाद करना चाहिए और आम लोगों के भ्रम को भी दूर करना चाहिए।

पेपरलेस व्यवस्था का विरोध या समर्थन करने से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि नई व्यवस्था वास्तव में लोगों के लिए आसान बने। अगर डिजिटल प्रणाली पारदर्शिता के साथ गति और सुविधा भी देती है, तभी इसका उद्देश्य पूरी तरह सफल माना जाएगा।

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